20248 तक विकसित देश संभवतः गर्भाशय ग्रीवा कैंसर को समाप्त कर देंगे, गरीब देशों में धीमी प्रगति: अध्ययन

नई दिल्ली, 27 अप्रैल 2024: एक ताजा अध्ययन में बताया गया है कि उच्च गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के मामलों वाले राज्यों में इस बीमारी के मामलों में सबसे अधिक कमी आने की संभावना है। हालांकि, विकसित और अमीर देशों में इस कैंसर को 2048 तक समाप्त करने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं गरीब और कम विकसित देशों में इस दिशा में प्रगति बहुत धीमी है।
इस अध्ययन के अनुसार, जहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, नियमित स्क्रीनिंग और टीकाकरण कार्यक्रम लागू हैं, वहां गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के मामलों में निरंतर गिरावट देखी जा रही है। हालांकि विकासशील देशों में स्वच्छता, जागरूकता और स्वास्थ्य सेवा की सीमित पहुंच के कारण यह बीमारी अभी भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में HPV (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन के दायरे बढ़ाने और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा उपलब्ध कराने से बड़ी संख्या में महिलाओं की जान बचाई जा सकती है। इसके अलावा, स्वास्थ्य अधिकारियों को स्थानीय जनसंख्या के लिए कैंसर जागरूकता अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाने पर जोर देना होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर महिलाओं में होने वाले दूसरे सबसे सामान्य कैंसर में से एक है। हर साल विश्वभर में लाखों महिलाएं इससे प्रभावित होती हैं और कई महिलाओं की इससे मृत्यु भी होती है। यह बीमारी खासकर कम आय वाले देशों में अधिक प्रचलित है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है।
अध्ययनकर्ता डॉ. रीटा शर्मा ने कहा, “हमें गर्भाशय ग्रीवा कैंसर को खत्म करने के लिए वैश्विक स्तर पर तत्परता और सहयोग बढ़ाना होगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां इसकी दरें सबसे अधिक हैं। अगर शीर्ष आय वाले देश इस लक्ष्यों को हासिल कर रहे हैं, तो इसके पीछे स्वास्थ्य ढांचे, जागरूकता और सरकारी समर्थन का बड़ा योगदान है। हमें इसी मॉडल को अन्य देशों में भी अपनाना होगा।”
सरकारों और गैर-सरकारी संस्थाओं को मिलकर कैंसर रोकथाम की रणनीतियों को मजबूती प्रदान करनी होगी, जिससे जल्दी पहचान और उपचार संभव हो सके। साथ ही सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को दूर करके महिलाओं तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुगम करनी होगी।
संक्षेप में, उच्च गर्भाशय ग्रीवा कैंसर वाले राज्यों में सबसे अधिक सुधार की गुंजाइश मौजूद है, लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब सभी स्तरों पर एक समन्वित प्रयास किया जाएगा। वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय को यह समझना होगा कि गरीब और विकासशील देश इस लड़ाई में पीछे नहीं रह सकते, क्योंकि किफायती और प्रभावी रोकथाम माध्यम मौजूद हैं।




